Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
परिगलितविकल्पतामुपेतं प्रगलितवाञ्छमदीनसारसत्त्वम् ।
त्रिजगति यदतिप्रसन्नरूपं प्रमुदितमन्तरनुत्तमं मनो मे ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
परिपूर्ण मन:स्थिति का ही वर्णन कर रहे श्रीरामजी उपसंहार करते हैँ ।
भगवन्, मेरे मन से समस्त विकल्प छिन्न-भिन्न हो गये हे । इच्छाएँ भी निकल गयी । अकार्पण्य से
उसकी स्थिरता भी दृढ़ हो गई है । तीनों लोको में प्रसिद्ध पूर्णचन्द्र, क्षीर-सागर, शरदाकाश आदि
जितने प्रसन्न-स्वरूप पदार्थ है, उन सबका उसने अतिक्रमण कर दिया हे, भीतर से वह खिल उठा है ।
यही कारण है कि वह सर्वोत्तम होकर स्थित हे