Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
बोधाद्भवति चित्तान्तो दुर्बोधाच्चित्तवेदिता ।
बालवेतालवत्तेन मोहश्रीर्घनतां गता ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञान से चित्त का अन्त होता हे । भ्रान्तिवश से ही चित्त का सद्भाव ज्ञात होता है, बालकल्पित
वेताल की नाई भ्रान्ति से मोह भी घनरूपता प्राप्त करता है