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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

विद्यमानमपि ह्येतच्चित्तं बोधाद्विलीयते । सदप्यसदिवाभाति ताम्रं हेमीकृतं यथा ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानियों का भी व्यवहार दिखाई पड़ने के कारण उनका चित्त है ही, यह मानना पडेगा, फिर आप कैसे कहते हैं कि ज्ञान से चित्त नष्ट हो जाता है 2 अस्तित्व और नष्टत्व ये दोनों विरुद्ध होने के कारण एक समय में एक स्थान पर रह नहीं सकते, इस पर कहते हैं। विद्यमान भी ज्ञानी का चित्त बोध से विलीन हो जाता है और सुवर्णीकृत ताम्र की नाई सत्‌ होता हुआ भी असत्‌-सा भासता है