Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
ज्ञस्य चित्तं न चित्ताख्यं ज्ञचित्तं सत्त्वमुच्यते ।
नामार्थान्यत्वभाक्चित्तं बोधात्ताम्रसुवर्णवत् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी का चित्त चित्तनाम का नहीं कहा जाता, किंतु ज्ञानी का
चित्त सत्त्व कहा जाता है। जैसे ताम्र सोना होकर नामतः ओर अर्थतः अन्य हो जाता है, वैसे ही बोध से
ज्ञानी का चित्त नामतः और अर्थतःअन्य हो जाता है