Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
न संभवति चित्तत्वं तेन तत्प्रविलीयते ।
भ्रमः शाम्यति बोधेन नाभावो विद्यते सतः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त का स्वरूप वास्तव में किसी भी काल
में नहीं है, उसका स्वरूप भ्रान्तिजनित है, इसलिए उसका विलय हो जाता है। भ्रान्ति तत्त्वज्ञान से
शान्त हो जाती है। जो सद्रूप वस्तु होती है उसका विनाश कभी नहीं होता इसलिए घट आदि का
विनाश होने पर भी कपाल आदिरूप से उनका अवशेष दिखाई पड़ने के कारण सद्वस्तु का स्वरूपतः
विनाश कहीं पर भी प्रसिद्ध है ही नहीं, यह कहना ठीक ही है