Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अवस्त्वेव विकल्पात्म चित्तादि शशश्रृङ्गवत् ।
सर्वं तदात्मनस्तस्मात्तद्धि बोधाद्विलीयते ॥ ३२ ॥
चित्तं सत्त्वं समायातं किंचित्कालं जगत्स्थितौ ।
विहृत्य तुर्यावस्थायां तुर्यातीतं भवत्यतः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
वस्तु का तत्वज्ञान अवस्तुरूप कल्पितांशमात्र का बाधक होता है, इस प्रसिद्धि से भी सत्त्वांश के
बाध की प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं।
खरगोश के सींग की नाई विकल्परूप चित्त आदि अवस्तुभूत ही हैं, वे सब पारमार्थिकरूप आत्मा
के विवर्त हैं, इसलिए उनका आत्मज्ञान से विलय हो जाता है