Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैव भूरिभवनभ्रमविभ्रमौघैरित्थं स्थितं सममनेकतयैकमेव ।
सर्वात्म संभवति नेतरदङ्ग किंचिच्चित्तादिकं च न हृदीव हि संनिवेशः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तर देते हैं।
सांसारिक अवस्था में कुछ काल तक सत्त्वरूपता को प्राप्त हुआ यह चित्त तुरीयावस्था में विहारकर
तदनन्तर तु्यतीत हो जाता है। विहार, समाधि और तत्त्वसाक्षात्कार पर्यन्त उसकी अवस्था पारमार्थिक
नहीं रहती, किंतु प्रारब्ध से प्रतिबद्ध अविद्यावश से जनित बाधितानुवृत्ति ही है । विदेह कैवल्य में
आविर्भूत तुर्यातीतअवस्था ही उसकी परमार्थ सत्ता है, यह तात्पर्य है ॥३ ३॥
वुर्यातीतस्वरूप ब्रह्म जब तक ज्ञात नहीं होता, तब तक चित्त, जगत् आदि मिथ्यावेष से स्थित
होकर सर्वात्मक होता है। वास्तव में चित्त आदि कुछ भी दूसरी वस्तु नहीं है । इस प्रकार के ज्ञानमात्र से
चित्त आदि का ब्रह्ममात्रस्वभाव से अवशेष युक्त ही है, इस आशय से कहते हैं।
हे प्रिय रामजी, जैसे मनोरथ से कल्पित महल, उपवन, वापी आदि का सन्निवेश हृदय में समावेश
न हो सकने के कारण ही वास्तव में कुछ नहीं हैं, वैसे ही परम सूक्ष्म छिद्रशून्य चिदेकरसघन ब्रह्म में भी
समावेश न हो सकने के कारण जगत् भी नहीं है । ब्रह्म ही अनेक भुवनरूप भ्रम-विश्रमों के समूह से
स्वयं सम, सर्वात्मक और एकरूप होता हुआ भी इस तरह अनेकरूप से स्थित हुआ है। वास्तव में
दूसरा कुछ नहीं है