Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 45, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
समस्तफलसारस्य फलस्यास्य महाकृतेः ।
न मज्जा नाष्ठि विततो निर्विकारो निरञ्जनः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त फलों एवं पुरुषार्थो मे श्रेष्ठ,
महान् आकारवाले इस फल में न गुदा हे ओर न गुठली ही है, अतः अत्यंत विस्तृत यह निर्विकार एवं
निरंजन ही है