Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 45, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
शिलान्तरिव नीरन्ध्रः स्यन्दमानेन्दुबिम्बवत् ।
रसं स्वसंविदास्वाद्यं स्यन्दमान इवामृतम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह शिला के भीतरी प्रदेश की नाई छिद्ररहित यानी घनीभूत (७) है और अमृत का
स्राव कर रहे चन्द्रविम्ब की नाई स्वानुभव से अमृत की तरह स्वाद लेने योग्य यह बिल्व निरतिशय
आनन्दस्वरूप रस बहा रहा है