Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 45, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अयं संकल्पविस्तारस्त्वयमाशान्तरभ्रमः ।
रागद्वेषस्थितिरियं हेयोपादेयधीरियम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार आध्यात्मिक विषय भी यह है, यह कहते हैं।
यही (७) (चितिशक्तिस्वरूप ब्रह्म) संकल्प का विस्तार है, यही दूसरी दिशा में दूसरी दिशा का
भ्रम हे, यही चितिशक्ति रागद्वेष की अवस्था है और यही हेय ओर उपादेय बुद्धि है