Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अप्यत्यन्तघनाङ्गायाः सुनीरन्ध्राकृतेरपि ।
विद्यतेऽन्तर्जगद्वृन्दं व्योम्नीव विपुलानिलः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जैसे आकाश में विपुल पवन रहता है, वैसे
ही अत्यंत घनीभूत अंगोंवाली और छिद्रशून्यस्वरूपवाली होती हुई भी इस चितिरूप शिला के अन्दर
मायावश यह जगत्-समूह रहता है