Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः ।
सन्ति तस्यां शिलायां च सुषिरं न मनागपि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि मायावश उस चितिरूप शिला में स्वर्ग, पृथिवी,
वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ ओर दिशाएँ विद्यमान हैं; तथापि उसमें तनिक भी छिद्र नहीं है