Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
तत्तां समुपयात्याशु जलबिन्दुरिवाम्भसि ।
अनन्तत्वाच्चितेरेतद्विकारादि चितेरिति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर “चिति के अनंतशक्ति होने के कारण विकार आदि की यह सृष्टि उस चिति
से विकार आदि नामपूर्वक ही हुई है" इसलिए (&) उक्तिमात्र से जो सिद्ध होगा, वह उक्ति के प्रलय से
लीन हो जायेगा (कवि-वर्णित विचित्र गन्धर्वनगर आदि की तरह केवल उक्ति से सिद्ध हो जाने से भी
विकार प्रमातृचैतन्यमात्ररूप ही हो जायेंगे, यह तात्पर्य हे ।)