Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथा ब्रह्माण्डकूश्माण्डमज्जामेर्वादिसंस्थितिः ।
तथा चिद्विल्वमज्जेयं ब्रह्माण्डादिजगत्स्थितिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी कहते हैँ ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जिस प्रकार ब्रह्माण्डरूप पेठे की मज्जा यानी सार मेरुपर्वत
आदि की स्थिति है, उसी प्रकार चैतन्यात्मक इस बिल्वफल की मज्जा ब्रह्माण्ड आदि जगत् की स्थिति
ही है