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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सृष्टिचिद्विल्वमज्जा स्यात्स्वाधारान्यत्वसंभवे । विनाशः सर्वगस्यास्य न चैतत्संभवत्यलम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

चैतन्यात्मक उस बिल्वफल की ब्रह्माण्ड आदि जगत्‌-स्थिति मज्जा है, ऐसा कहने पर किसीको यह भरम हो सकता है कि वह मज्जा भीतरी प्रदेश मेँ स्थित अवयवो का रसमय परिणाम विशेष ही होगा, तो उसका निवारण करते हैं। जैसे बिल्वफल का खप्पड उस फल की मजा का यानी गुद्दी का आधार होता है, वैसे ही सृष्टिस्वरूप चैतन्यात्मक इस बिल्वफल की मज्जारूप आधेय से खप्परस्थानीय स्वाधार यदि कोई दूसरा हो तो मज्जा उसके अन्दर की परिणामस्वरूप हो सकेगी । (परंतु स्थिति वैसी नहीं है; किंतु मज्जा और उसका आधार दोनों एक ब्रह्मरूप ही हैं) । यदि सर्वव्यापी इस चिदात्मा को सर्वावयव अवच्छेदेन अथवा एकदेशावच्छेन परिणामी मानेंगे तो उसकी नाशापत्ति कभी हटाई नहीं जा सकती । और इस निरवयव चिदात्मा में न कोई मुख्य अन्तःप्रदेश है ओर न परिणाम ही हो सकता है। अतः यहाँ मज्जा शब्द परिणाम का वाचक नहीं है, यह भाव है