Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
यथा शिलान्तर्लेखादि भिद्यते न शिलान्तरात् ।
तत्सारत्वाज्जगत्कर्तृ कर्तृत्वादिजगच्चितिः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
(किंतु शिलामय ही है); उसी तरह जीव एवं ईश्वर का रूप ओर कर्तृत्व आदि जगत् एकमात्र चैतन्यरूप
होने से चिति से भिन्न नहीं हैं, किंतु चितिरूप ही हैँ