Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यथा शिलान्तरब्जानां स्पन्दास्पन्दभवाभवाः ।
विषयत्वं न गच्छन्ति कर्तारो जगतस्तथा ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
शिला के भीतर स्थित कमलों की गति एवं
अगति, आविर्भाव और तिरोभाव शिला के तत्त्वसाक्षात्कार से जैसे शिला से पृथक् विषयता को प्राप्त
नहीं होते यानी वे शिला से भिन्न सिद्ध नहीं होते, वैसे ही आत्मतत्त्व के साक्षात्कार से जगत् के कर्ता
जीव, ईश्वर आदि कोई भी उससे पृथक् सिद्ध नहीं होते