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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

स्निग्धा स्पष्टा मृदुस्पर्शा महाविस्तारशालिनी । निविडा नित्यमक्षुब्धा क्वचिदस्ति महाशिला ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त-प्रेम का आस्पद होने से स्निग्ध (चिकनी), स्वयंप्रकाश होने से स्पष्ट प्रतीयमान सुख ही हेतु होने से मृदुल स्पर्शवाली, असीम होने के कारण महाविस्तार से युक्त, सन्तत होने से निबिड, नित्य एवं अक्षुब्ध स्वभाववाली कहीं (0) एक महती शिला है