Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यथा सम्यक् पयोराशिः कोटरे कलनोन्मुखम् ।
द्रवत्वात्स्पन्दतेऽस्पन्दं तथेदं चिद्धनान्तरम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार समुद्र
मध्यमे द्रवत्व होने से भलीभाँति प्रस्पन्दित (संचलित) होता है, उसी प्रकार स्पन्दरहित भी चितिशिला
का मध्य कल्पना से उन्मुख होकर संचलित-सा (स्पन्दित-सा) होता है