Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चिच्छिलाशङ्खपद्मौघस्तन्मयत्वेऽप्यतन्मयः ।
जगद्विद्धि सपद्मादिपदार्थं चिच्छिलान्तरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब जैसे वहाँ पद्म आदि शिलामय प्रतीत होते है, वैसे ही जगत् के शंख, पद्म आदि भी चिन्मय
प्रतीत क्यो नहीं होते 2 इस पर कहते है ।
श्रीरामजी, कमल आदि पदार्थों से युक्त इस जगत् को चिति-शिला के भीतर ही स्थित जानिए।
चिति-शिला के भीतर रहनेवाले ये शंख, पद्म आदि के संघात परमार्थतः चिन्मय होने पर भी अविद्यावश
अचिन्मय-से भासते हैं