Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
महाशिलाघनोऽप्येष चिद्धनस्थं शिलोदरम् ।
अरन्ध्रोनिर्द्वयोऽच्छोऽजः संशान्तःसंनिवेशवत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्तरूप से कही गयी प्राकृत शिला भी परमार्थ-दुष्टि से विति-शिला का उदर ही है यानी
चितिरूप ही है, यह कहते हैं।
श्रीरामजी, यह दृष्टान्तरूप से कही गयी महाशिला भी चिद्घन में स्थित शिलोदर है यानी चितिरूप
ही है। (चूँकि उसके चितिरूप होने से शिल्पकार के हजार प्रयत्न करने पर भी उसमें छिद्र आदि की
संभावना नहीं है, इसलिए) छिद्ररहित, अद्वितीय निर्मल, नित्य और शांतस्वरूप वह मिथ्या सन्निवेश
की नाई भासती है