Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
तपतीदं जगद्ब्रह्म शरत्काल इवामलम् ।
स्फुरतीदं जगद्ब्रह्म सौम्यः सोम इव द्रुतः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार 'शरत्-काल तपता है (अमृत टपकानेवाला सोम स्फुरित हो रहा है” यों एकमात्र
कालस्वरूप सूर्य और सोम में अवान्तर भेदो की कल्पना द्वारा क्रिया-कारणभाव से व्यवहार होता है,
उसी प्रकार ब्रह्म जगत् को प्रकाशित करता है“, “वह (ब्रह्म) जगद्रूप से स्फुरित हो रहा है“ यह व्यपदेश
भी होता है, ऐसा कहते हैं।
“निर्मल यह ब्रह्म इस जगत् को प्रकाशित करता है ' ऐसा जो व्यवहार होता है, वह शरत्काल की
तरह है यानी 'शरत्-काल प्रकाशित करता है” इस व्यवहार के अनुसार ही होता है । और "यह ब्रह्म
जगद्रूप से स्फुरित होता है” यह भी जो व्यवहार होता है, वह नयनानन्दकारी अमृतद्गुत सोम के समान
है यानी (अमृत टपकानेवाला सोम स्फुरित होता है” इस व्यवहार के अनुरूप ही है