Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणीदं सुषुप्ताभं नास्त्यनाशं शिलाब्जवत् ।
ब्रह्मत्वं ब्रह्मणि यथा तथैवेदं जगत्स्थितम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में (जगद्रूप से यह जगत् मानों सदा नष्ट है” अथवा ब्रह्मरूप से मानों सदा स्थित है
ऐसी उत्प्रेक्षा कर सकते हैं, इस आशय से कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी, जैसे शिला-कमल कमलरूप से नित्य ही असत् है, वैसे ही वासनामात्रस्वरूप
होने से सुषुप्ततुल्य यह जगत् भी अपने जगद्रूप से ब्रह्म में नहीं है यानी असत् है एवं ब्रह्मरूप से सत् भी
है, (क्योंकि) जिस प्रकार ब्रह्मत्व ब्रह्म में स्थित रहता है, उसी प्रकार यह जगत् भी ब्रह्मरूप होने से ब्रह्म
में स्थित हे