Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
भावाभावादि नास्त्येषां तस्या इव कदाचन ।
ब्रह्मैव जगदाभासं मरुतापो यथा जलम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति के स्वरूप की नाई जगत् के भी भाव, अभाव आदि विकार
कभी नहीं होते, क्योंकि जिस प्रकार मरू-मरीचिका जलरूप से भासती है, उसी प्रकार ब्रह्म ही
जगद्रूप से भासता है