Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्थिता जगत्पदार्थेषु पायसी ब्रह्मता तथा ।
रसशक्तिर्यथा नानातृणगुल्मलताम्भसाम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूल पदार्थ के वैचित्र्य से सत्ता के अवान्तर धर्मरूपो से ही सत्ता का जो वैचित्र्य होता है, उसमें
भी ऐसे दष्टान्तो की कल्पना की जा सकती है, इस आशय से कहते है ।
जैसे तृण, गुल्म आदि पदार्थों में स्थित नाना जलों में पदार्थों के वैचित्रय से रसशक्ति नानारूपों से
उदित होती है, वैसे ही वही ब्रह्मरूपता नानारूपों से उदित होती है