Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
यतः सदसतो रूपं भावस्थं विद्धि तं परम् ।
नानाऽनानात्मकमिदं त्वनुभूतं नसंभवम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर उस तत्त्व का स्वरूप, अद्वितीय होने के कारण, भिन्न एवं अभिन्न स्वभाव से अनुभूत जगत् हो
नहीं सकता यानी वस्तुतः वह अनुपपन्न ही हे । (इस प्रकार उक्त जगद्रूपता की अनुपपत्ति होने पर भी
मयूराण्डरस के दष्टान्त से ही एकरूपता लानी चाहिए, इस आशय से कहते हैँ ।) जैसे आप मयूराण्ड में
रस ओर मयूर एकरूप ओर नानारूप देखते हैं, वैसे ही चैतन्य और जगदात्मक माया को एकरूप ओर
नानारूप देखिए