Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
चिज्जगद्वलनं पश्य बर्ह्यण्डे रसबर्हिणम् ।
यथा जगति चित्तत्त्वं चित्तत्त्वे यज्जगत्तथा ।
नानाऽनानात्मकैकं च मयूराण्डरसो यथा ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, जैसे जगत् में चैतन्यात्मक तत्त्व अनुस्यूत है, वैसे ही मयूर में
मयूराण्डरस भी अनुस्यूत है और जैसे चिति-तत्त्व में जगत् लीन है, वैसे ही मयूराण्डरस में मयूर भी
लीन है, यह आप देखिए । वह नानारूप भी है और अनानारूप यानी एकरूप भी हे