Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
नानापदार्थभ्रमपिच्छपूर्णा जगन्मयूराण्डरसश्चिदाद्या ।
मयूररूपं त्वमयूरमन्तः सत्तापदं विद्धि कुतोऽस्ति भेदः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
उपमा द्वारा कहे गये अर्थ को रूपक से एकीकरण कर दिखलाते हुए भेद का निरास करते हैं।
अनेकविध पदार्थ-भ्रमरूप पंखों से परिपूर्ण आद्य ब्रह्म-चिति ही जगद्रूप मोर के अण्डे का रस है।
उसमें भासनेवाली मयूरस्वरूप जगदात्मक जो वस्तु है, उसे तो मयूर भिन्न सत्तास्वरूप परमार्थवस्तु
ब्रह्म जानिए । वहाँ भेद का अवसर ही कहाँ है ?