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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

फलस्यान्तःसंनिवेशो नामानुक्रमतो यथा । चितः स्वसत्ताघनताऽनाना नाना स्थिता तथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

इससे प्रातिभासिक अनुक्रमो के वैचित्र्य चिति के अधीन हैं, इस आशय से ही उसकी फलरूप से उत्प्रेक्षा की गई है, यह कहते है। जैसे फल के भीतर वृक्ष, अंकुर आदि की रचना का अनुक्रम रहता है, वैसे ही चिति की अपनी चिद्घनरूप सत्ता अनाना और नानारूप होकर स्थित है