Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अनानैवापि नानैव क्षुब्धेवाक्षुभितैव च । यथा फलान्तः स्वासत्ता चिदन्तः सिद्धयस्तथा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें अनानात्व आदि अंश ही प्रथम होने से सत्य हैं, यह कहते हैं। वह चिति अद्वितीय होने पर भी नाना-सी है और क्षोभरहित होती हुई भी क्षुब्ध-सी है। जैसे फल के भीतर विद्यमान अंकुर, मज्जा आदि की फल से अतिरिक्त सत्ता नहीं है, वैसे ही इस चिति के भीतर विद्यमान जगद्‌-रूप सिद्धियों की अतिरिक्त सत्ता नहीं है