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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

जगन्नगरमादर्शे चितः स्वं प्रतिबिम्बितम् । कचतीवाऽकचदपि शिलान्तःसंनिवेशवत् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

शिलाख्यान का तात्पर्य दिखलाते हैं। “शिलान्तःसन्निवेशवत्‌ जगत्‌ (शिला के भीतर चित्रित कमल आदि की नाई यह जगत्‌ दीखता है) यह जो कहा गया है, उसका भी एकमात्र तात्पर्य यही है कि दर्पण में प्रतिबिम्बित नगर की नाई चिति का अपना रूप ही प्रतिबिम्बित होता है, जो कि वास्तव में प्रतिबिम्बित भी नहीं होता