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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

परमे चिन्मणौ सन्ति जगत्कोटिशतान्यपि । चिन्तामणावनन्तानि फलानीवार्पितान्यलम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा जैसे चिन्तामणि में चिन्तको के सभी मनोरथरूप फल विद्यमान रहते हैं, वैसे ही चिति में मायिक अनन्त शक्तियो के रहने के कारण यह सम्पूर्ण जगत्‌ विद्यमान है, यों उसका तात्पर्य लगाना चाहिए, यह कहते हैं। जिस प्रकार चिन्तामणि में चिंतकों के अनन्त फल पर्याप्तरूप से समर्पित रहते हैं, उसी प्रकार परमचितिस्वरूप मणि में सौ करोड जगत्‌ भी रहते हैं