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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

चित्समुद्गक एवेदं तदङ्गोत्कीर्णमाततम् । जगन्मौक्तिकमाभाति तदंशमयमन्यवत् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

किंवा, मोती के सीप के संपुट में कल्पित विकाररूप अंशांशिभाव से जैसे मोती रहते हैं, वैसे ही चिति में भी कल्पित अंशांशिभाव से जगत्‌ रहता है, यह तात्पर्य है, ऐसा कहते हैं। चितिरूप मुक्ता-कोष में ही यह विस्तृत जगत्‌-रूपी मोती उसी के गर्भ में मानों उत्पन्न होकर उसके अंशरूप होता हुआ भी अन्य-सा भासता हे