Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
सबाह्याभ्यन्तरस्यास्य नात्माकाशस्य खण्डना ।
तच्च देहादि सकलमात्मैवात्मविदां वर ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या देह आदि ब्रह्म से पृथक् हैं ? इस पर नहीं” ऐसा कहते है।
आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ श्रीरामजी, वह देहादि सम्पूर्ण जगत् आत्मरूप ही है, वह एकमात्र बोध की
विरूपता से यानी भ्रमात्मक ज्ञान से ही किंचित् पृथक्-सा स्थित भासता है, यह आप जानिए