Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
केवलं बोधवैरूप्यादीषत्पृथगिव स्थितम् ।
विष्वगात्ममयं विश्वं ज्ञातं बुद्ध्या सुसिद्धया ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी, चारों ओर से श्रवण, मनन आदि उपायों से परिष्कृत बुद्धि से आपने यह विश्व
आत्मस्वरूप है, यह जान लिया हे