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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

प्रज्वलन्नपि कार्येषु निर्वाणो निर्ममो भव । यदिदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजंगमम् ॥ १८ ॥ तत्सर्वं ब्रह्म निर्धर्म निर्गुणं निर्मलात्मकम् । निर्विकारमनाद्यन्तं नित्यं शान्तं समात्मकम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए व्यवहार करते हुए भी आप निर्विकार आत्मा के दर्शन से (साक्षात्कार से) नित्यमुक्तस्वरूप होते हुए स्थित हो जाइए, यह कहते हैं। अतएव अपने राज्य शासन के योग्य व्यवहारो मेँ दीप्ति सम्पन्न होते हुए भी आप शांत एव ममताशून्य हो जाइए । स्थावर एवं जंगम स्वरूप जो कुछ यह जगत्‌ दीखता है, वह सब धर्मशून्य, गुणरहित, निर्मलस्वरूप, निर्विकार, आदि एवं अंत से रहित, सर्वदा शांत तथा समस्वभाव ब्रह्मरूप ही है, यह जानिए