Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
कालक्रियाकरणकर्तृनिदानकार्यजन्मस्थितिप्रलयसंस्मरणादि सर्वम् ।
ब्रह्मेति दृष्टवत एव तवात्मदृष्ट्या भूयोऽपि किं भ्रमणमङ्ग समङ्ग एव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, "काल, क्रिया, करण, कर्ता, कारण, कार्य, जन्म, स्थिति,
प्रलय, स्मरण आदि सब जगत् ब्रह्म ही है” इस प्रकार आत्मदुष्टि से देख रहे आपका क्या फिर भी
संसार में भ्रमण हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता; क्योकि आप वस्तुतः समंग (सम ब्रह्म) ही
हैं यानी सदा ही अविषम ब्रह्म-स्वरूप प्राप्त कर चुके हैं