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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

तथैव चित्तचेत्यादिस्पन्दात्कुर्वन्ति संस्थितिम् । यथा ह्लादयति स्वच्छः पल्लवं रश्मिरैन्दवः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उन लोगों के व्यवहार में बाह्य विषयों में बुद्धिवृत्तियों का संगम होने पर भी त्रिपुटी में अभिव्यक्त हुआ निरतिशय आनन्दरूप आत्मा उस प्रकार आह्लाद पहुँचाता है, जिस प्रकार चन्द्रकिरणे वृक्षों के पल्लवां के भीतर घुसकर आह्लाद पहुँचाती हँ । इससे ज्ञानी का समस्त व्यवहार सुखरूप ही है, यह भाव जानना चाहिए