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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

आवर्तः सलिलस्येव यः स्पन्दस्त्वयमात्मनः । प्रोक्तः प्रकृतिशब्देन तेनैवेह स एव हि ॥ ३० ॥ यथैकः स्पन्दपवनौ नाम्ना भिन्नौ न सत्तया । तथैकमात्मप्रकृती नाम्रा भिन्ने न सत्तया ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जल के आवर्तं की नाई जो यह आत्मा का विवर्तन है, वही प्रकृति शब्द से कहा गया है और सन्मात्रस्वभाव से अपने विवर्त में वह आत्मा ही है, दूसरा नहीं