Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अबोधादेतयोर्भेदो बोधेनैव विलीयते ।
अबोधात्सन्मयो याति रज्ज्वां सर्पभ्रमो यथा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
वायु ओर उसका स्पन्दन एक ही पदार्थ हैं और नाम से दोनों भिन्न होते हुए भी सत्ता से वे भिन्न नहीं ह,
वैसे ही आत्मा और प्रकृति ये दोनों एक हैं और नाम से भिन्न होते हुए भी वे सत्ता से भिन्न नहीं हँ ॥ ३ १॥
जैसे अवबोध से सन्मात्र सर्पभ्रम रज्जु में रूपान्तर को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही बोध न होने से इनमें भेद
मालूम पड़ता है ओर वह भेद बोध से ही पुनः विलीन हो जाता हे