Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यादृगाद्यन्तयोर्वस्तु तादृगेव तदुच्यते ।
मध्ये यस्य यदन्यत्वं तदबोधाद्विजृम्भितम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
मध्य में ब्रह्म का विकार से स्पर्श नहीं होता, यह कैसे मालूम पडता है ? ऐसी यदि कोई शंका करे
तो वह ठीक नहीं है, क्योकि आदि और अत में विकार स्पर्श करने का जो स्वभाव निश्चित है, वही
मध्य में भी विकार के असंस्पर्श में हेतु है, यह कहते हैं।
आदि और अंत में जिस स्वरूप की वस्तु विद्यमान रहती है, उसी स्वरूप की वह कही जाती
है। यदि मध्य में उसकी अन्यरूपता दिखलाई पड़ती है, तो वह केवल अज्ञान के कारण ही दिखाई
देती है