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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

शाम्यामि शीतलाकारः सुखं तिष्ठामि केवलम् । प्रसादमनुयातोऽहं सरो निर्वारणं यथा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, मैं अब एकमात्र उत्तम शान्ति का अनुभव कर रहा हूँ ओर शान्त आनन्दित होकर सुखपूर्वक स्थित हू | विक्षुब्ध करनेवाले हाथियों से रहित सरोवर जिस प्रकार प्रसन्न रहता हे, वैसे ही मै प्रसन्नता प्राप्त कर रहा हू