Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सम्यक्प्रसन्नमखिलं दिङ्मण्डलमिदं मुने ।
यथाभूतं प्रपश्यामि निर्नीहारमिवाधुना ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, अब मुझे कुहरे से शून्य दिशाओं के मंडल की नाई भली प्रकार प्रसन्न यह समस्त
जगत यथार्थभूत सन्मात्रस्वरूप प्रतीत हो रहा है