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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

जातोऽस्मि गतसंदेहः शान्ताशामृगतृष्णिकः । रागनीरागनिर्मुक्तो मृष्टजङ्गलशीतलः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, मैं सन्देह से निर्मुक्त हो गया हूँ, मेरी आशारूप मृगतष्णा विलीन हो गई है, विषयसंसर्ग ओर उसके विरोधी वैराग्य वृत्तियों से रहित हो गया हूँ तथा कुहरे ओर धूलि से शून्य शरत्कालीन जंगल की नाई स्वच्छ हो गया हूँ