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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

आत्मनैवान्तरानन्दं तत्प्राप्तोऽस्म्यन्तवर्जितम् । रसायनरसास्वादो यत्र नाथ तृणायते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे नाथ, मैं अपने आप से ही अविनाशी उस आनन्द को प्राप्त हुआ हूँ, जहाँ पर अमृत का रसास्वाद भी तृण के सदृश नीरस होकर उपेक्षणीय हो जाता है