Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अनाद्यन्तं जगद्बीजं यद्ब्रह्मास्ति निरामयम् ।
भारूपं शुद्धचिन्मात्रं कलाकलनवर्जितम् ॥ १४ ॥
कलनोन्मुखतां यातमन्तर्जीव इति स्मृतः ।
स जीवः खलु देहेऽस्मिंश्चिनोति स्पन्दते स्फुटम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पुर्यष्टक का स्वरूप बतलाने के लिए महाराज विष्ठजी पहले उसके मूलभूत अज्ञात ब्रह्मतत्त्व
का निर्देश करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामभद्र, आदि ओर अन्त से शून्य, विकारवर्जित, प्रकाशस्वरूप,
शुद्धचैतन्यमात्रस्वरूप, माया के आक्रमण से रहित तथा जगत् का कारण जो ब्रह्मतत्त्व है वह पहले
आकाश आदि सूक्ष्मभूतं की रचनाकर अनन्तर अपंचीकृत उन भूतो से लिगदेह ओर पंचीकृत उन भूतों
से ब्रह्माण्ड की रचना करता हे । अनन्तर वह ब्रह्मतत्त्व ही उस ब्रह्माण्ड के भीतर प्रतिबिम्बात्मक कल्पना
की उन्मुखता प्राप्त कर अभिमानवश जब सूत्रात्म-प्राणों को धारण करता है तब वह "जीव" यों कहा
जाता हे । अनन्तर वह इस देह में वासनाओं तथा अंगों के उपचय से पुष्ट होता है और पुष्ट हुआ वही
जीव बाह्य एवं आभ्यन्तर व्यापाररूप चेष्टाएँ भलीर्भोति किया करता हे