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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

अहंभावादहंकारो मननान्मन उच्यते । बोधनिश्चयतो बुद्धिरिन्द्रदृष्टेस्तथेन्द्रियम् ॥ १६ ॥ देहभावनया देहो घटभावनया घटः । एष एव स्वभावात्मा जनैः पुर्यष्टकं स्मृतः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अभिमान, मनन आदि व्यापारो के भेद से उसके अहंकार, मन आदि भिन्न-भिन्न नाम है, यह कहते हैं। अपने शुद्ध चैतन्यमात्रस्वरूप का विस्मरण होने पर देह आदि में "अहम्‌" अभिमान से वह “अहंकार कहा जाता है, संकल्प आदिरूप व्यापार से 'मन' कहलाता है, बोध के निश्चयात्मक व्यापार से “बुद्धि कहलाता है और इन्द्ररूप आत्मा द्वारा दृष्ट यानी तत्तत्‌ कर्मो से उपार्जित होने के कारण "इन्द्रिय (५) कहलाता है। वही देहरूप भावना से “देह” बनता हे ओर घटाकार भावना से घट । उक्त समस्त व्यापारं में साधारणस्वभावरूप यह आत्मा विद्वानों द्वारा “पुर्यष्टक' कहा गया है