Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
काले काले ततो जीवस्त्वन्योन्यो भवति स्वतः ।
भाविताकारयानन्तवासनाकणिकोदयम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए स्व-स्वरूपभरूत समझी गई बुद्धिवृक्तियो का कालमेद से भेद होने के कारण जीव भी
(&) “उन्द्रियमिन्द्रलिंगमिन्द्रदुष्ट इत्यादि (५-२-९३) सूत्र से इन्द्रियशब्द “इन्द्रदूष्टट इस अर्थ
में ही निपातित है ।
(>) “अहंकारकलायुक्तं बुद्धिजीवसमन्वितम् । तत्पुर्यष्टकमित्युक्तं भूतहृत्पद्मपटूपदः ॥” इस
लक्षण से लक्षित पुर्यष्टक का ही यह प्रकारान्तर से वर्णन है ।
काम, क्रोध, हर्ष विषाद आदि से युक्त होकर अनेक-सा हो जाता है, यह कहते हैं।
तदनन्तर अध्यासवश स्वात्मरूप जानी गई बुद्धिवृत्तियों से वही जीव समय-समय पर काम, क्रोध,
हर्ष, विषाद आदि द्वारा स्वयं ही अनेकरूप-सा हो जाता हे । ओर काल पाकर अपने पुर्यष्टक स्वभाव
उस आकार को प्राप्त करता हे, जिसमें अनन्त वासनारूपी कणिकाओं का उदय होता है