Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
पुर्यष्टकस्वभावेन कालेनाकारमृच्छति ।
यथावासनतः सेकाद्बीजं पल्लवतामिव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बीजों के आकार अंकुर, काण्ड, पल्लव आदि होते हैं, वैसे ही उसी समष्टिव्यष्टयात्यक जीव
के ये सब जगत् आकार होते हैं, इस आशय से कहते हैं।
जैसे सिंचन से बीज के पल्लव आदि आकार होते हैं, वैसे ही वासना के अनुसार समष्टि-
व्यष्टयात्मक उस जीव के भी मैं, शरीर आदि, स्थावर आदि एवं जंगम आदि सब जगत् आकार होते
हैं