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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

भ्रमत्येव जगज्जीवो वासनावलितश्चिरम् । ऊर्ध्वाधोगमनैरब्धौ काष्ठं वीचिहतं यथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

वासनाओं से वेष्टित हुआ यह जीव चिरकाल तक स्वर्ग-नरक में आवागमनों द्वारा जगत्‌ में उस प्रकार घूमता ही रहता है, जिस प्रकार समुद्र में तरंगों से ताड़ित काष्ठ